घर का खोप

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घर का खोप


यह कविता घर के उस छोटे, सरल लेकिन भावनाओं से भरे संसार का चित्रण करती है जिसे कवि "खोप" कहता है। इसमें घर के आँगन, दीवारें, रसोई, माँ-पिता, बहन और बचपन की यादों को बड़े ही भावुक अंदाज़ में दर्शाया गया है। कविता बताती है कि घर केवल ईंट-पत्थर से नहीं बनता, बल्कि उसमें बसते हैं रिश्ते, यादें, हँसी और आँसू। हर छोटी-छोटी चीज़, जैसे टूटी कुर्सी या रोटियों की खुशबू, एक कहानी कहती है। अंततः यह कविता इस बात को उजागर करती है कि सादगी से भरा अपना घर ही असली सुख और प्यार का स्थान होता है – एक ऐसा खोप, जहाँ दिल को सुकून मिलता है।
: Wishcard Sangeeta

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