कैसा लगा

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कैसा लगा


यह कविता उस इंसान की पीड़ा को दर्शाती है, जिस पर कोई केस दर्ज हो गया है। कविता बताती है कि कैसे एक मुकदमे के चलते उसकी ज़िंदगी बदल जाती है — खुशियों की जगह तनाव, ख्वाबों की जगह अदालत की तारीखें और नाम के साथ बदनामी जुड़ जाती है। सच और झूठ के बीच की लड़ाई में गवाह थक जाते हैं और न्याय की देवी भी निष्पक्ष दिखाई नहीं देती। अंत में, कविता एक उम्मीद जगाती है कि एक दिन सच की जीत होगी और इंसान की खोई हुई इज़्ज़त वापस लौटेगी।

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