प्रकृति का उपहार

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प्रकृति का उपहार


आ रही है सौंधी -सौंधी खुशबू जमीं से, करम मेघा का कह रही हूं यकीं से, लोटूं मैं इसके आंचल तले, करूं याद लड़कपन के लम्हे हंसी से, आओ सखी हम बनाए मिट्टी के घरौंदे , शायद उभरे मासूमियत अब यहीं कहीं से।

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