मुझको भी जीने दो
Added Successfully to library!
मुझको भी जीने दो
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
यह कविता "मुझे जीने दो" हर उस नारी की आवाज़ है जो समाज की बेड़ियों में जकड़ी होकर भी खुलकर साँस लेने की हक़दार है। यह एक भावुक पुकार है, सम्मान, स्वतंत्रता और समान अवसर की।
: विजय सांगा
Add To Library
21
Views
5
Ratings
1 Min
Duration
लाइब्रेरी
श्रेणी
लिखे
अपडेट
शॉप