प्रकृति की पुकार

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प्रकृति की पुकार


यह कविता आज की प्रकृति की विनाशकारी स्थिति को दर्शाती है, जहाँ मनुष्य के तथाकथित विकास और स्वार्थ के कारण प्रकृति अपने मूल स्वरूप को खो रही है। कवि बताता है कि कैसे कभी हरे-भरे जंगल और साफ नदियाँ अब कंक्रीट के जंगलों, प्रदूषण और कचरे** से घिर गई हैं।
: Simple Human

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