मुझे भी जीने दो
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मुझे भी जीने दो
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
कब तक यूँ दबेगा मेरा स्वर? कब तक सहूंगा ये बेक़दर? नफरत के बीज न बोओ यूँ, मुझमें भी तो है प्रेम भरपूर।
: rani
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