दहलीज ना छोड़ पाया मैं
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दहलीज ना छोड़ पाया मैं
कविता
दहलीजें सिर्फ दरवाज़ों की नहीं जिंदगी में हर कदम कदम पर होती है अगर-मगर ये-वो यहां वहां, उम्र के हर पड़ाव के असमंजस में होती है
लेखक : शौकिया शायर
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