बिना मन बात

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बिना मन बात


यह कहानी साक्षी नाम की एक शांत, अंतर्मुखी लड़की की है जो बचपन से ही अपनी भावनाएं और विचार मन में दबाकर रखती है। वह हमेशा दूसरों की बातें सुनती है लेकिन खुद की कभी नहीं कहती, जिससे उसका आत्मविश्वास धीरे-धीरे कम होता जाता है। स्कूल, परिवार और समाज में उसका यह व्यवहार धीरे-धीरे आदत बन जाता है – बिना मन की बात को मन में ही दबाकर जीना। एक दिन स्कूल में वार्षिकोत्सव के दौरान साक्षी को मंच पर अपनी लिखी कहानी पढ़ने का अवसर मिलता है। वह अपनी डायरी से एक भावुक लेख प्रस्तुत करती है – "जब मैंने खुद से माफ़ी मांगी", जिसमें उसने अपने मन की वे सारी बातें लिखी होती हैं जो वह कभी किसी से कह नहीं पाई थी। उसकी प्रस्तुति सबको भीतर तक छू जाती है और तालियों से पूरा हॉल गूंज उठता है। इस अनुभव के बाद साक्षी खुद को बदलती है – अब वह सिर्फ दूसरों की नहीं, अपनी भी सुनती है। वह आगे चलकर एक शिक्षिका बनती है और अपने छात्रों को भी यही सिखाती है कि मन की बात दबाना नहीं, कहना ज़रूरी है। हर व्यक्ति के भीतर कुछ न कुछ ऐसा होता है जिसे वह कह नहीं पाता, लेकिन जब मन की बात बाहर आती है, तो न सिर्फ वह व्यक्ति बदलता है, बल्कि दूसरों को भी सकारात्मक दिशा में प्रेरित करता है।
: Wishcard Sangeeta

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