हार नहीं मानूंगी
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हार नहीं मानूंगी
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
समाज के तानों ने रोका कई बार, पर मैंने जलाया अपने भीतर का दीया हर बार। जो कहा 'तू लड़की है, रुक जा यहीं', मैं बोली — 'मैं उड़ान हूँ, रुकती नहीं'।
लेखक : Erica
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