मैं नदी हूं
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मैं नदी हूं
कविता
कविता
कभी उग्र बनती धारा मेरी, कभी शांत-सी संजीवनी तेरी। धरती को मैं हरियाली देती, सूखे मन में नमी भर देती।
: rani
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