सांझा
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सांझा
कविता
कविता
साँझा थी वो चुप्पियाँ, वो रातेँ, जिनमें बसती थीं हज़ारों बातें। तेरे मेरे बीच कोई पर्दा न था, जैसे रूहों का रिश्ता सच्चा था।
: rani
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