सपने देखना और पूरा करना सबका अधिकार है पर कुछ औरतें सपने छोड़ अपने घर को सभांलना, सजाना चुनती है। इसका मतलब यह नहीं कि वह कुछ भी नहीं करती है। अगर वह घर न सभांले तो क्या वह घर, घर कहलाएगा?
आज की कविता उन सभी गृहणियों को समर्पित है बड़ी सिद्दत से अपने घर को घर बनाती है।
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