पाप की दुनियां
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पाप की दुनियां
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
मौत अब ज़िंदगी से बेहतर लगती, हर सुबह एक सज़ा सी लगती। उम्मीदें राख हो चुकी हैं अंदर, पाप की दुनिया है—अब जीवन का मंजर।
लेखक : Erica
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