मुसाफिर – वादी-ए-पहलगाम

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मुसाफिर – वादी-ए-पहलगाम


चढ़ा बस्ता यादों का कंधे पे, निकला था वो मुसाफ़िर, ख्वाबों की घाटियों में, तलाशता इक तस्वीर। पहुंचा वो वादी-ए-पहलगाम, जहां बहती थीं नदियाँ, हर एक पत्थर कहता था किस्से, जैसे कोई बंद किताब खुली हो।
लेखक : Erica

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