"क्या मैं बोझ हूँ?" एक संवेदनशील और आत्ममंथन से भरी कविता है, जो एक व्यक्ति की आंतरिक पीड़ा और अस्तित्व के प्रश्न को उजागर करती है। यह कविता उन अनकहे जज़्बातों को स्वर देती है जो अक्सर समाज के नजरअंदाज़ कर दिए गए लोगों के दिल में पलते हैं। अपनी सादगी भरी भाषा और गहराई से भरे भावों के माध्यम से यह रचना हर पाठक के दिल को छू जाती है और सोचने पर मजबूर करती है कि किसी के जीवन को 'बोझ' कह देना कितना अनुचित और असंवेदनशील हो सकता है।