मुझे जीने दो-एक लेखक की जुबानी
यह कविता एक लेखक की अंतरात्मा की पुकार है — एक ऐसी आवाज़ जो दुनिया के सामने खुलकर नहीं आती, क्योंकि उसे विश्वास और समझ की कमी का डर है। कविता उस दर्द और संघर्ष को बयां करती है, जो लेखक ने अपने जीवन में झेला — भूख, अपमान, षड्यंत्र और अकेलापन।
इन सबके बावजूद, लेखक ने हार नहीं मानी। उसने अपने जज़्बातों को कलम के ज़रिए शब्दों में ढाला और अपनी दास्तां को कविता के रूप में दुनिया को सुनाई।
यह सिर्फ एक कविता नहीं, एक गहराई से भरी आत्मकथा है — एक लेखक की जुबानी।