मुझे जीने दो

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मुझे जीने दो


यह कविता एक नारी की गहराई से निकली पुकार है, जिसमें वह समाज द्वारा लगाए गए बंधनों, भेदभाव और मर्यादाओं से मुक्त होकर जीने की माँग करती है। वह कहती है कि वह सिर्फ एक रिश्तों की पहचान नहीं, बल्कि एक स्वतंत्र इंसान भी है जिसे अपने सपनों, सोच और भावनाओं के साथ जीने का हक़ चाहिए। वह परंपराओं, बंदिशों और चुप्पियों से बाहर निकलकर अपनी पहचान बनाना चाहती है। कविता संघर्ष, आत्मसम्मान और स्वतंत्रता की भावना को दर्शाती है और समाज से यही विनती करती है—"मुझे जीने दो"।
: Wishcard Sangeeta

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