ख़ुदा देख रहा है
Added Successfully to library!
ख़ुदा देख रहा है
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
कविता: ख़ुदा देख रहा है भीड़ में गुम हुए, चेहरों का मेला, हर चेहरा पहने, कोई झूठा चोला। हक़ छीनते हाथों को, सज़ा ना मिली, पर इक नज़्म सी चलती रही, बोली दिली।
लेखक : A.K Thakur
Add To Library
48
Views
5
Ratings
2 Min
Duration
लाइब्रेरी
श्रेणी
लिखे
अपडेट
शॉप