ख़ुदा देख रहा है

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ख़ुदा देख रहा है


कविता: ख़ुदा देख रहा है भीड़ में गुम हुए, चेहरों का मेला, हर चेहरा पहने, कोई झूठा चोला। हक़ छीनते हाथों को, सज़ा ना मिली, पर इक नज़्म सी चलती रही, बोली दिली।

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