एक अछूत नहीं, उम्मीद की लौ"

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एक अछूत नहीं, उम्मीद की लौ"


शाम चुकी थी, लेकिन ज़मीन पर कीचड़ अब भी बाकी था। गाँव के कोने में एक टूटी-सी झोंपड़ी के सामने बैठी छोटी सी लड़की, गीली मिट्टी से सने अपने पैरों को देख रही थी। उसका नाम था श्यामा।
: Naaz

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