यह कविता "परछाई" के माध्यम से आत्मचिंतन और जीवन की यात्रा को दर्शाती है। इसमें कवयित्री अपनी परछाई को एक आत्मीय साथी की तरह देखती है, जो हर परिस्थिति में – बचपन के डर, युवावस्था की उलझनों, रिश्तों के दर्द और वृद्धावस्था की तन्हाई में – उसके साथ बनी रहती है। परछाई को प्रतीक बनाया गया है आत्मा, अतीत और अंतर्मन का, जो हमेशा साथ रहता है, पर मौन रहता है। अंत में यह परछाई कवयित्री को यह एहसास दिलाती है कि वह कभी अलग नहीं थी, बल्कि वही परछाई उसकी आत्मा का ही एक हिस्सा थी।