इश्क़ मुक़्क़मल - सरहद के पार
साल 1947 वह साल जिसे कोई नहीं भूलना चाहेगा। जिस साल ने दो देश की सरहद ही नहीं बल्कि उनके दिलों को भी बाँट कर रख दिया लेकिन कहते हैं नफरत चाहे कितनी भी गहरी क्यों ना हो मोहोब्बत अपना रास्ता निकाल लेती है। रहीम और अमन जो इसी जंग मे अपनी मोहोब्बत के लिए मरे थे लेकिन एक दूसरे के साथ कसमें खाकर कि वह फिर जन्म लेंगे और फिर एक दूसरे को तलाश करेंगे। अमन जो पाकिस्तान में अरहम बनकर जन्मा वही रहीम हिंदुस्तान मे अवीर बनकर। तो क्या इस जन्म में अमन और रहीम अपनी मोहोब्बत को ढूंढ पाएंगे? क्या वह पहचान पाएंगे एक दूसरे को? क्या इस बार मुकम्मल होगी उनकी मोहोब्बत या फिर से फना होकर बिखर जायेगा उनका इश्क़ फिर सरहद की दहलीज पर आकर?