गुमशदा
मध्य दिसंबर की ठंड भरी रात थी। प्रभाकर जी जल्दी से खा पी कर रजाई में घुस गए थे।
समय अभी ज्यादा नहीं हुआ था। पर रजाई की गर्माहट और पेट भरा होने की वजह से आँखें बोझिल होने लगी थीं उनकी।
तभी पुलिस की गाड़ी के हु हूं कि आवाज से उनकी नींद में व्यवधान पड़ गया।
वो सोचने लगे कि इतनी रात में किसके घर पुलिस आ गई।
आस पास सभी घर पंडितों के ही थे। सभी बेहद सुसंस्कारी और पढ़ें लिखे थे।
उन्हें घड़ी देख ज्यादा समय नहीं हुआ था। अभी रात के साढ़े ग्यारह ही बजे थे।
वो अनुमान लगा रहे थे कि गाड़ी किधर जा कर रुकती है।
अभी गाड़ी उनके घर के करीब आ रही थी।
पर ये क्या..? गाड़ी की आवाज तो उनके दरवाजे पर आ कर ही बंद हो गई।
वो अभी उठते उसके पहले ही दरवाजे पर दस्तक के साथ पुकार हुई। ना चाहते हुए भी उन्हें रजाई की गर्माहट छोड़ कर के उठना पड़ा।
“प्रभाकर जी..! पर प्रभाकर जी…”
प्रभाकर जी ने जल्दी से कुरसी पर पड़ी शाल को उठा कर लपेटा और पैरों में चप्पल डाल कर चल पड़े बाहर मेन दरवाजे की ओर।
दरवाजा खोला तो दो पुलिस वाले खड़े थे।
एक पास आया और अपने मोबाइल में एक फोटो दिखाते हुए पूछा,
“ये आपका बेटा है.?”
प्रभाकर जी के चश्मा ठीक किया और आंखे गड़ा कर देखने की कोशिश की।
फिर कुछ सेकंड बाद ना में सिर हिलाया और बोले,
“नहीं.. ये तो मेरा बेटा नहीं है।”
पुलिस वाले ने पूछा,
“आपका बेटा कहां है प्रभाकर जी..?”