आजादी – बंधन से

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आजादी – बंधन से


जब बेड़ियां पैरो को जकड़ लेती हैं तो कुछ सपने अंदर ही अंदर टूटने लगते हैं। उन्ही बंधनों को तोड़ कर मंजिल की और बढ़ने का प्रयास हैं! बस यही हैं आज की कविता। आंचल गुप्ता ✍️...

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