राधा कृष्ण की होली
फागुन आया मस्ती छाई,
हर फूल कली खुद पर इतराई।
कण कण धरती का महके है,
हर पल ये दिल बहके है।
चारों ओर फैली खुमारी है,
क्योंकि रंगों वाली होली आई है।
अबकी रंग हम ऐसे खेलेंगे,
जैसे राधा कृष्ण खेलते थे।
इक दूजे को ऐसे अपने,
रंग में रंगते थे।
ना चढ़े उन पर कोई रंग दूजा,
ऐसे होली वो खेलते थे।
ना रंग गुलाल ना पिचकारी,
इक दूजे का रंग ही पड़ता था