नाराजगी के साए में

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नाराजगी के साए में


"नाराजगी के साए में" कविता रिश्तों में आई दूरियों, ग़लतफ़हमियों और चुप्पियों के दर्द को दर्शाती है। यह बताती है कि नाराजगी धीरे-धीरे दिल में गहरी जड़ें जमा लेती है और प्यार भरे रिश्तों को कमजोर कर देती है। कवि उन पुरानी यादों को याद करता है जब रिश्ता अपनापन और मोहब्बत से भरा था, लेकिन अब वही रिश्ता ख़ामोशियों और नजरें चुराने तक सीमित रह गया है। कवि सवाल करता है कि आखिर इस नाराजगी की वजह क्या है—क्या कोई शब्द चुभ गया या कोई चुप्पी गुनाह बन गई? वह यह भी मानता है कि अगर गलती उसकी थी, तो उसे माफ़ी मिलनी चाहिए, और अगर गलती दूसरे की थी, तो उसे स्वीकार किया जाना चाहिए। वह चाहता है कि रिश्ते को एक और मौका मिले, ताकि दोनों फिर से मुस्कुरा सकें और पुरानी ग़लतफ़हमियों को भुला सकें। अंत में, कविता एक भावनात्मक गुहार लगाती है कि इस नाराजगी को और न बढ़ाया जाए, क्योंकि अगर इसे समय रहते खत्म न किया गया, तो प्यार का दिया बुझ सकता है। इसलिए, कवि अपने प्रिय को खुलकर दिल की बात कहने और नाराजगी को मिटाने की अपील करता है।

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