बचपन में नासमझ थे, फिर भी खुश थे। हर रिश्ता सच्चा लगता था, बेफिक्री में दिन बीतते थे। लेकिन जब दुनिया की समझ आई, तो खुशियों की जगह दुखों ने ले ली। अब हर रिश्ता स्वार्थी, हर हंसी अधूरी लगती है। काश, फिर से वो नासमझी लौट आए और बचपन जैसी खुशियां मिल जाएं।