तक़दीर का खेल

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तक़दीर का खेल


रात का खेल घड़ी की सुइयां रात के दो बजा रही थीं। शहर की सुनसान गलियों में सिर्फ स्ट्रीट लाइट की हल्की रोशनी थी। रोहन एक पुरानी फैक्ट्री के बाहर खड़ा था, उसकी सांसें तेज चल रही थीं। अंदर से उसकी आत्मा चीख रही थी—"आज या तो मैं जियूंगा, या सब खत्म हो जाएगा।"
: Naaz

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