यह कविता बचपन की मासूमियत और यादों की मिठास को समर्पित है। इसमें एक साधारण मिट्टी की गुल्लक को न केवल सिक्कों के संग्रह का माध्यम बताया गया है, बल्कि इसे बचपन के सपने, आशाएँ और परिवार के प्यार का प्रतीक भी बताया गया है। दादी, माँ और पापा की तरफ से मिली सीख और प्यार से भरपूर ये गुल्लक, बचपन की खुशियों और छोटी-छोटी उपलब्धियों का स्मरण कराता है। अंत में, गुल्लक के टूटने पर भी उन सुनहरी यादों की अनमोल महक बनी रहती है।