रोज की तरह प्रकाश एक दिन उसी जगह बैठकर अपने छोटे भाई सूरज को याद कर रहा था, तभी वहां एक बलराम नाम का युवक हाथ में चाय के दो कुल्हड़ लिए उसके पास आ कर कहता है “आप बुरा ना मानो तो मेरे साथ चाय पीते हुए यह बताओ कि आप परसों से रोज इस जगह आकर कुछ देर उदास बैठ चले जाते हो, ऐसा रोज़ क्यों करते हो ऐसा मैं खुद कई वर्षों से देख रहा हूं।”
बलराम को देखकर ना जाने क्यों प्रकाश को बहुत अपनापन सा महसूस होता है, इसलिए वह अपने दिल में छुपे दुख को उसके सामने उगल देता है।
अब प्रकाश सूरज के मिलने के साथ-साथ नदी के किनारे पर रोज बलराम के आने का भी इंतजार करने लगा था।