स्वैच्छिक दोस्ती

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स्वैच्छिक दोस्ती


गर्मी की शाम थी। सूरज धीरे-धीरे ढल रहा था, लेकिन आसमान अब भी सुनहरी आभा से भरा था। हल्की हवा बह रही थी, और मिट्टी की सोंधी खुशबू मेरे दिल में बीते सालों की यादों को ताजा कर रही थी। मैं अपने गांव लौटा था—जहां बचपन बीता, जहां दोस्त थे, और जहां जिंदगी की मासूमियत अब भी कहीं न कहीं जिंदा थी।
: Naaz

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