सूरज धीरे-धीरे आसमान में ऊँचाई पकड़ रहा था। हल्की ठंडी हवा के साथ सुबह की हलचल शुरू हो चुकी थी। शहर के कोने में लगे पुराने चौक पर एक बूढ़ा आदमी अपना ठेला खड़ा कर रहा था। उसकी आँखों में अनुभव की गहराई थी और चेहरे पर हल्की झुर्रियाँ। मगर इन सबसे ऊपर, उसके ठेले पर रंग-बिरंगे गुब्बारे थे, जो हवा में लहराते हुए किसी स्वप्नलोक का आभास करा रहे थे।