Love marriage श्राप या पुण्य

client-img

Love marriage श्राप या पुण्य


कहानी नेहा और अमन की प्रेम विवाह से उपजी कठिनाइयों और रिश्तों की कसौटी पर खरी उतरी उनकी जिदंगी की गाथा है। नेहा, एक परंपरागत राजपूत परिवार की बेटी थी, जहां मान-सम्मान और सामाजिक मर्यादा सर्वोपरि थी। उसके पिता रघुनाथ सिंह चौधरी गांव में इज्जतदार व्यक्ति थे, जो अपनी बेटी को उच्च शिक्षा देने के पक्ष में तो थे, लेकिन प्रेम विवाह जैसी बातों को अपने कुल की बेइज्जती मानते थे। नेहा की मुलाकात शहर में पढ़ाई के दौरान अमन से हुई। अमन एक साधारण परिवार का लड़का था, जो मेहनत और ईमानदारी में विश्वास रखता था। दोनों की दोस्ती कब प्यार में बदल गई, इसका उन्हें पता ही नहीं चला। मगर इस प्यार की राह आसान नहीं थी। नेहा जानती थी कि उसका परिवार इस रिश्ते को कभी मंजूर नहीं करेगा। घर लौटने पर जब नेहा ने हिम्मत करके पिता से अमन के बारे में बताया, तो घर में हंगामा मच गया। पिता ने उसे चेतावनी दी कि अगर उसने यह कदम उठाया, तो उसके लिए इस घर के दरवाजे हमेशा के लिए बंद हो जाएंगे। मगर नेहा ने अपने दिल की सुनी। अमन के साथ उसने घर छोड़ दिया और कोर्ट मैरिज कर ली। शादी के बाद नेहा और अमन ने शहर में एक छोटे से किराए के कमरे में अपनी जिंदगी की शुरुआत की। अमन नौकरी करता था और नेहा ने भी एक स्कूल में शिक्षिका की नौकरी पा ली। उनके पास पैसे कम थे, मगर उनके पास एक-दूसरे का प्यार था। मगर समाज ने उन्हें कभी चैन से जीने नहीं दिया। मकान मालिक से लेकर ऑफिस के सहकर्मी तक, सब उन्हें ताने मारते। इधर, नेहा के माता-पिता ने अपनी बेटी से नाता तोड़ लिया था। गांव में उनकी इज्जत पर सवाल उठाए जा रहे थे। मां अंदर ही अंदर घुल रही थी, मगर पिता के गुस्से और समाज के डर ने उनके जज्बातों को कैद कर रखा था। नेहा भी तड़पती थी, मगर उसने हालात से समझौता कर लिया था। समय बीता। नेहा मां बनी। उसने एक प्यारी सी बेटी को जन्म दिया—अवनि। अवनि की किलकारियों ने उनके छोटे-से घर को खुशियों से भर दिया। मगर जैसे-जैसे अवनि बड़ी हुई, उसकी मासूम जिज्ञासाएं नेहा के दिल को चीरने लगीं। जब स्कूल में ग्रैंडपेरेंट्स डे आया और अवनि ने नाना-नानी को बुलाने की जिद की, तो नेहा का दर्द छलक उठा। नेहा ने एक बार फिर पिता को पत्र लिखा, मगर जवाब वही था—"मेरे लिए तू मर चुकी है।" अमन ने भी अब हार मान ली थी। उसका प्यार भी अब कभी-कभी तानों में बदल जाता था। आर्थिक परेशानियां, समाज के ताने और अपनों की बेरुखी ने नेहा के आत्मविश्वास को झकझोर दिया था। एक दिन नेहा के पिता को ब्रेन स्ट्रोक हुआ। यह खबर सुनते ही नेहा ने अपने अतीत को भुलाकर पिता से मिलने का निर्णय लिया। अमन ने भी उसका साथ दिया। जब नेहा कई साल बाद चौधरी हवेली पहुंची, तो मां ने उसे देखकर गले से लगा लिया। भाई ने भी आंखों में नम्रता दिखा दी, मगर पिता का गुस्सा अभी बाकी था। पिता चारपाई पर थे, बोल नहीं सकते थे। नेहा ने उनके पैर छुए और कहा, "पिता जी, मुझे माफ कर दीजिए। मैं आपकी वही नेहा हूं, आपकी बेटी। यह आपकी नातिन अवनि है। क्या इसे भी दादा का आशीर्वाद नहीं मिलेगा?" रघुनाथ सिंह की आंखों में आंसू आ गए। कांपते हाथों से उन्होंने नेहा के सिर पर हाथ रखा। वर्षों से जमी बर्फ पिघल गई। मां ने अवनि को गोद में उठा लिया। हवेली की दीवारें पहली बार मुस्कुरा उठीं। नेहा ने उस दिन जाना कि प्यार कभी श्राप नहीं होता। समाज की दीवारें वक्त के साथ कमजोर पड़ जाती हैं, लेकिन प्यार हमेशा अमर रहता है। उसकी हिम्मत, उसकी सच्चाई और अमन का साथ, आखिरकार उनके रिश्ते को समाज और परिवार में जगह दिला गया। इस कहानी का अंत यही बताता है कि प्रेम और विश्वास जीवन में सबसे बड़े पुण्य हैं। परिवार की मान्यताएं, समाज की परंपराएं महत्वपूर्ण हैं, लेकिन जीवन का असली अर्थ प्यार और रिश्तों को समझने में है। नेहा ने प्यार करके कोई श्राप नहीं पाया, बल्कि अंत में उसने पुण्य ही कमाया। पिता की आंखों का आशीर्वाद और अवनि की किलकारियों ने यह साबित कर दिया कि प्यार की जीत कभी श्राप नहीं होती। समाज भले कुछ समय तक विरोध करे, पर अंततः इंसानियत और स्नेह की भावना ही हर मन की दीवार तोड़ देती है।

19

Views

5

Ratings

11 Min

Duration


  • लाइब्रेरी

  • श्रेणी

  • लिखे

  • अपडेट

  • शॉप