अपहरण

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अपहरण


अपहरण जो होते होते रह गया। मैं छोटी थी जब स्कूल जाने लायक उमर हुई तो मेरा एडमिशन एक अच्छे स्कूल में करा दिया गया। मैं खुश तो थी पर स्कूल जाने को ले कर नहीं। बल्कि रस्ते में पढ़ने वाले एक रेलवे पुल को ले कर। क्योंकि वहां खूब सारी ट्रेन दिखती थी। मुझे ट्रेन देखना बहुत अच्छा लगता था। पर स्कूल में बैठ कर पढ़ाई करना बिल्कुल अच्छा नहीं लगता था। मैने इसका उपाय अपनी बाल बुद्धि के अनुसार खोज लिया। मैं स्कूल जाती अपनी बड़ी बहन के साथ। पर स्कूल से मौका देख कर सब की नज़र बचा कर के निकल लेती थी और पुल पर आ कर बैठ जाती थी। वहां बैठ कर आती जाती ट्रेनों की देखती और खुश होती थी। जब भूख लगती तो लंच बॉक्स बैग से निकाल कर खा लेती थी। फिर जब छुट्टी होती बच्चे लौटते देखती स्कूल से तो उनके साथ हो लेती थी। बड़ा मजा आता था मुझे। दिन बड़े ही मस्ती से कर रहे थे। पर ये मौज ज्यादा दिन नहीं चल पाई। एक दिन मुझे पुल पर बैठे किसी परिचित ने देख लिया। उसने घर जा कर के मेरी मम्मी को बता दिया कि मैं पुल पर बैठी हुई हूं। मम्मी भाग कर आई। और वहां से मुझे ले कर घर आई। पहले मम्मी ने मेरी कुटाई की। फिर ड्यूटी से आने के पापा ने सुना तो उन्होंने भी पीटा। फिर मुझे खूब समझाया गया। टीचर को भी मेरा खांड ध्यान रखने के लिए कहा गया। मेरे स्कूल से भागने की आदत छुड़ाने के लिए घर और स्कूल दोनों जगह सब सतर्क थे। परिणाम स्वरूप मैं स्कूल से निकाल ही नहीं पाती थी।

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