बोलतीं आंखें
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बोलतीं आंखें
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
जीसने भरी सभा में खोलें कहीं राज़ गहरे, हमारी नज़र उन बोलतीं आंखों पर ही ठहरे।
लेखक : Nidhi s
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