बोलती आंखें
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बोलती आंखें
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
बोलती हैं ये आँखें, कुछ कहती नहीं, दिल के समंदर की गहराइयाँ सहती नहीं। कभी शबनमी ओस, कभी जलते अंगारे, कभी प्रेम की गंगा, कभी बिखरे सितारे।
: Aastha
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