चांदनी रात
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चांदनी रात
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
रात चांदनी की जब आती है, तन मन मुस्का उठता है। उसकी निर्मल शीतलता से, सब तपन शांत हो जाता है उस रात भी तो चांदनी छिटकी थी, जब हम तुम पहली बार मिले थे।
: निर्मेश
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