कर्मो का मेला

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कर्मो का मेला


कर्मों का मेला सर्दियों की कुनकुनी धूप दिल्ली के पॉश इलाके में बसे वर्मा दंपत्ति के बालकनी में फैली हुई थी। निशा वर्मा इंस्टाग्राम पर एक नई पोस्ट डाल रही थीं - "कुंभ नगरी की ओर! आध्यात्म और भक्ति का अनोखा संगम!" उनके पति, अजय वर्मा, सोफे पर बैठे मोबाइल पर कुंभ मेले के बारे में वायरल वीडियो देख रहे थे। "निशा, इस बार कुंभ में हमारे फॉलोअर्स को जलवा दिखाना है - महाकुंभ का अनुभव लेना है, लेकिन स्टाइल से - हमने वीआईपी टेंट बुक कर ही लिया है - बस, सफाई का ध्यान रखना पड़ेगा।" अजय ने मुस्कराते हुए कहा। निशा ने सहमति में सिर हिलाया और फिर बोली, "मम्मी जी प्रयागराज में ही तो रहती हैं, मिलना ठीक रहेगा?" अजय ने भौंहें चढ़ाते हुए जवाब दिया, "नहीं, हमें टाइम ही कहां मिलेगा? फिर वहाँ की गंदगी, उनका पुराना घर... कोई मतलब नहीं - बस कुंभ देखेंगे, तस्वीरें लेंगे और लौट आएंगे।" दोनों ने सरे हिलाया और सर्वेंट को अपने सामान पैक करने को बोल दिया| वर्मा दंपत्ति विशेष सुविधा वाली ट्रेन से प्रयागराज पहुंचे। चारों ओर भीड़ थी, लेकिन वे अपने लक्जरी टेंट तक सुरक्षित पहुँच गए। चारो तरफ बस भीड़ ही भीड़ दिख रही थी| अजय ने अपने ब्रांडेड चश्मे के पीछे से जनसागर को देखा और झुंझलाते हुए कहा, "ये लोग इतनी भीड़ में आते ही क्यों हैं?" निशा ने उनकी बात अनसुनी कर दी और नया सेल्फी स्टिक निकालकर सोशल मीडिया के लिए पोज़ देने लगी। उनके फॉलोअर्स लाइक और कमेंट्स की बौछार कर रहे थे। दोनों का ध्यान बस तस्वीरे लेने और पोस्ट करने में था| उसी शहर में, प्रयागराज के एक छोटे से मोहल्ले में, अजय की बूढ़ी माँ, लक्ष्मी देवी, अपने बेटे के आने की खबर सुनकर उत्साहित थीं। वर्षों से वे अपने बेटे को देख नहीं पाई थीं। उन्होंने कई बार फोन मिलाया, लेकिन अजय ने व्यस्तता का बहाना देकर बात टाल दी। बार बार कॉल लगाने पर जब से घर के नौकर ने उनका प्रयागराज में आना बताया था तब से वे बस उसी के इंतज़ार में थी| लक्ष्मी देवी अपने बेटे के इंतजार में हर शाम दरवाजे पर बैठतीं, लेकिन वह नहीं आया। मेला घूमने के दौरान निशा और अजय संगम तट पहुंचे। वे इंस्टाग्राम लाइव करने में इतने व्यस्त थे कि उन्होंने अपने आसपास के हालात पर ध्यान ही नहीं दिया। इस बार वहां लोगो का भारी हुजूम आया हुआ था| तभी अचानक भीड़ में भगदड़ मच गई। लोग इधर-उधर भागने लगे। किसी को नहीं पता था कि क्या हुआ, लेकिन अफरा-तफरी में अजय और निशा एक-दूसरे से बिछड़ गए। अजय का मोबाइल पानी में गिर गया, और निशा की पर्स भीड़ में कहीं खो गई। दोनों घबराए हुए थे। वीआईपी टेंट तक जाने का कोई रास्ता नहीं दिख रहा था। रात होने लगी। अजय घबराया हुआ इधर-उधर भटक रहा था। निशा रो रही थी। अब अँधेरा हो आया था| भगदड़ की वजह से वहां लाईट की व्यवस्ता तक खराब हो गई थी| तभी एक वृद्धा ने उन्हें सहारा दिया। वह उन्हें अपने छोटे से घर ले गई। "बेटा, भूख लगी है? थक गए हो? कुछ खा लो," वृद्धा ने प्यार से कहा। अजय और निशा ने कांपते हाथों से सूखी रोटी और गुड़ खाया। सुबह होने पर, जब सूरज की किरणें कमरे में आईं, तो अजय ने कमरे की दीवारों पर पुरानी तस्वीरें देखीं। "माँ..." अजय के होंठ कांप उठे। वृद्धा कोई और नहीं, उसकी अपनी माँ, लक्ष्मी देवी थीं। अजय का दिल बैठ गया। निशा के हाथ से गिलास छूटकर गिर पड़ा। "बेटा, तुम कुंभ देखने आए थे? लेकिन मैंने तो सोचा था कि तुम मुझसे मिलने आओगे।" लक्ष्मी देवी की आँखों में आँसू थे। अजय को एहसास हुआ कि वह वर्षों से अपनी माँ को नज़रअंदाज़ कर रहा था। अचानक, लक्ष्मी देवी की साँस तेज़ चलने लगी। अजय ने महसूस किया कि उस भगदड़ में उसकी माँ भी घायल हुई थी लेकिन उसके बावजूद उन्होंने उन दोनों की सहायता की| उन्होंने हाँफते हुए कहा, "बेटा, तुम आ गए, यह मेरे लिए काफी है - अब मेरी आत्मा मुक्त हो सकती है।" अजय ने उन्हें झकझोरते हुए रोते हुए कहा, "माँ, मैं बहुत स्वार्थी था - मुझे माफ़ कर दो!" लेकिन बहुत देर हो चुकी थी। लक्ष्मी देवी ने बेटे की गोद में आखिरी साँस ली। अजय और निशा सुन्न हो चुके थे। एक मेला जिसने उन्हें दिखावे के लिए बुलाया था, अब उन्हें सच्चे जीवन का पाठ पढ़ा गया था। लक्ष्मी देवी का अंतिम संस्कार करने के बाद अजय और निशा वापस दिल्ली लौट आए, लेकिन अब सब कुछ बदल चुका था। उनकी आलीशान ज़िन्दगी में एक खालीपन घर कर गया था। अजय ने माँ की याद में एक वृद्धाश्रम बनवाने का फैसला किया, लेकिन यह पश्चाताप की आग को ठंडा नहीं कर सका। कुछ महीनों बाद, अजय का बिजनेस डूब गया। एक दिन बैंक से कॉल आया - भारी कर्ज़ की वजह से उनकी संपत्ति जब्त की जा रही थी। वही लोग, जो कभी उनकी सोसाइटी में दोस्त बनकर घूमते थे, अब दूर भागने लगे। अजय समझ गया कि यह कर्मों का परिणाम था। माँ को भुलाने की सज़ा उसे ताउम्र भुगतनी थी। निशा, जो कभी सोशल मीडिया के लिए जीती थी, अब तस्वीरें पोस्ट करना भूल गई थी। अजय की आँखों में आँसू थे। वह मन ही मन बुदबुदा उठा - “हमने जो बोया, वही काट रहे हैं... यह कर्मों का न्याय है।” समाप्त...

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