परोपकार
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परोपकार
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
पहले की थी बात निराली, कोई दरवाजे से ना जाता था खाली। दिल में था परोपकार का भाव, जरूरत मंद को मिल जाती थी छांव। जिसकी छांव में पलते देखा, कईयों के दिन बदलते देखा। जो था सब मिल कर खाते थे, दुख के दिन कट जाते थे।
: निर्मेश
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