महबूब
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महबूब
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
महबूब मिले मुझे ऐसा, जो दिखे सांवरे के जैसा। महबूब मिले मुझे ऐसा, जो दिखे सांवरे के जैसा। जिसके दिल में ना छल कपट हो, स्वभाव से नटखट हो। करता हो दिल की चोरी, मेरी लगे ना कोई बात बुरी।
लेखक : निर्मेश
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