आखिरी पड़ाव
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आखिरी पड़ाव
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
मैं खुद को हर रोज क्यों संवारू जब मेरा मन ही नहीं होता मै संवरने के बाद गलियों मोहल्लों में क्यों निकलूं चुन्नी ओढ़कर जब मेरा मन मुझे आजाद लगता है।
: Anju sahu
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