मेरे गांव की महक
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मेरे गांव की महक
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
मेरे गांव की महक, थी इतनी प्यारी। जिसकी खुशबू है अभी भी, बहती है रगो में हमारी। लगता है जैसे अभी कल ही की तो बात हो। मस्त घूमते थे गलियों में, संग साथी संघाती सारे हमारे हो।
: निर्मेश
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