फिसलता वक्त
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फिसलता वक्त
दैनिक प्रतियोगिता
कविता
फिसलता है वक्त ऐसे, मुट्ठी से रेत जैसे। लाख कर को जतन तुम फिर भी, रोके ना रुकता है ये वक्त। चाहे अच्छा हो या कि कितना भी बुरा ये वक्त। सब गुजर ही जाता है, खुशी और ग़म के साथ ये वक्त।
: निर्मेश
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