दस्तूर इश्क का

जानता था पहले से ही मेरे चाहत का अंजाम यही होना है । जानता था तुम्हारा कुछ पलो का साथ है फिर तुम्हे खोना है । इसी लिए मुहब्बत भी सम्हल सम्हल कर कर रहा था मै इसी लिए बहुत तेज तुम्हारे साथ चलने से डर रहा था मै  जानता था पहले से मैं ही अधूरा हूं तुम हर तरह से पूरी हो । जानता था मै भटकता हिरन सा हूं तुम तो सुगंधित कस्तूरी हो । तुम मेरे लिए चांद थी और चांद को हर कोई छू नहीं सकता, भले ही तुम्हे मेरी जरूरत न हो पर तुम अब भी मेरे लिए जरूरी हो ।। खुद से ही खुद के दिल को समझा कर हौसला भर रहा था मै , इसी लिए मुहब्बत भी सम्हल सम्हल कर कर रहा था मै । मुझे पता है वो मुझसे दूर गया है जिसे मैने शिद्दत से चाहा है । सुकून बनाया है जिसे मैने अपना उसने ही सुकून चुराया है । तुम तो जुस्तजू थी आरजू थी मेरी बचपन की चाहत थी , तुम्हारे चेहरे में ही तो मुझे अपना ख्वाब सा नजर आया है । अपने उसी सपने को हकीकत में होने का जश्न कर रहा था मै , इसी लिए मुहब्बत भी सम्हल सम्हल कर कर रहा था मै ।। एक मजाक को दिल से लगा कर दिल का रिश्ता तोड़ लिया । इतनी जल्दी बहाना बना कर किसी और से रिश्ता जोड़ लिया । इतनी भी क्या जल्दी थी यार थोड़ा और खेल लेती मेरे दिल से , पहले हाथ बढ़ाया था जब पकड़ा हाथ तो बाहों को सिकोड़ लिया । तुम्हे पाकर आहिस्ते आहिस्ते अपने सपनो में रंग भर रहा था मै , इसी लिए मुहब्बत भी सम्हल सम्हल कर कर रहा था मै ।।

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लेखक : सुनील गुप्ता
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