यह कविता एक व्यक्ति की खामोशी को उजागर करती है, जो अन्याय और विनाश के बीच खड़ा होकर कुछ नहीं करता। उसकी चुप्पी इंसानियत के खिलाफ उसके गुनाहों का बोझ बन जाती है। यह रचना आत्मग्लानि और आत्मचिंतन की कहानी है, जहां मूकदर्शक अंततः अपनी खामोशी को तोड़ने और सत्य व न्याय के पक्ष में खड़े होने का संकल्प लेता है ।
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