भाग्य

इस कविता में भाग्य और कर्म के बीच के गहरे संबंध को सरल भाषा में प्रस्तुत किया गया है। कविता में भाग्य के उतार-चढ़ाव और उसके साथ कर्म की अहमियत को उजागर किया गया है। यह पाठकों को प्रेरित करती है कि वे भाग्य पर निर्भर रहने के बजाय अपने कर्म पर ध्यान केंद्रित करें और अपने जीवन को बेहतर बनाने का प्रयास करें।

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लेखक : विजय सांगा
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