इतिहास गवाह है कि जब जब प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जाता है, छेड़ छाड़ की जाती है तो प्रकृति पहले सब कुछ सहन करती है। पर जब हम अपनी सीमा को लांघ जाते है, प्रकृति के बारे में कुछ नहीं सोचते तब वो भी अपनी रक्षा हेतु उठ खड़ी होती है। प्रतिउत्तर देने को विवश होती है। तब नाराज़ प्रकृति का रोष हमे झेलना होता है। फिर हमें वो अपना जो रौद्र रूप दिखाती है कि हम विवश हो जाते हैं। कुछ भी हमारे हाथ में नहीं रहता है। हम खामोश खड़े उसकी विनाश लीला को देखते रहते हैं। इसका प्रत्यक्ष उदाहरण केदार नाथ की त्रासदी हैं। पत्थरों को काट काट कर केदार घाटी का स्वरूप बदल दिया गया।
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