अभिमान से स्वाभिमान तक

"अभिमान से स्वाभिमान तक" कविता का सारांश मानवीय चेतना के दो पहलुओं—अभिमान और स्वाभिमान—के बीच के अंतर को उजागर करता है। यह कविता बताती है कि अभिमान वह है, जो व्यक्ति को अहंकार और गलत रास्तों पर ले जाता है, जबकि स्वाभिमान आत्मसम्मान का प्रतीक है, जो व्यक्ति को विनम्र और सशक्त बनाता है। कविता में जीवन के उदाहरणों के माध्यम से यह दर्शाया गया है कि अभिमान से रिश्ते टूटते हैं, समाज बिखरता है, और मनुष्य अकेला पड़ जाता है। इसके विपरीत, स्वाभिमान से आत्मनिर्भरता और आत्मसम्मान का भाव विकसित होता है, जो व्यक्ति को दूसरों के प्रति संवेदनशील और अपने प्रति दृढ़ बनाता है। कविता अंत में संदेश देती है कि हमें अभिमान को त्यागकर स्वाभिमान को अपनाना चाहिए, क्योंकि यही सच्चा मानवीय गुण है, जो जीवन को सार्थक बनाता है।

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लेखक : R
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