सुबह का सपना

“बहु..! क्या मुझे जानवर समझ रक्खा है कि कुछ भी दे दोगी और मैं उसे चुप चाप से खा लूंगी। क्या आज रसोई में नमक खत्म हो गया है..? और मिर्च की बोरी खुली है..? किसी भी चीज में नमक है ही नहीं। मिर्च ही मिर्च भरी हुई है। अब कैसे खाऊं मैं। ( थाली सरकाती हुई बोली) ले जाओ इसे तुम ही खा सकती हो खा लो।” जब बहु कहने से बहु कोई जवाब नहीं दी तो उसे उसके सीमा ने उसे नाम से बुलाने की कोशिश की। पर ये क्या… उसे नाम क्यों याद नहीं आ रहा है..! उसे अपनी इकलौती बहु का नाम नहीं याद है..? ऐसा कैसे हो सकता है..! क्या वो इतनी बूढ़ी हो गई है कि अब अपने बच्चों का नाम याद नहीं है..! वो बहु..! बहु..! ही कहने लगी।

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: निर्मेश
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