शीर्षक - गहरे ज़ख्म गहरे जख्मों की बीती यादों के क्षण बिन कहें क्यों आ जाते है मुझसे मिलने बुझी बातों को याद दिला फिर सताते है क्यों मुझे दिन के पहरे में मुस्कान लिए रातों की चाँदनी को समेटकर भुला देती हूं अनकही सी बहुत सी बातें ऐ जिंदगी फिर क्यों मुझे सताती हो कुछ बातें पुरानी सी जो दिल को सताती बारंबार धीरे -धीरे डाल उन पर मिट्टी हौसलों की नींव तैयार कर रही हुँ मैं गहरे जख्म जो मिले जीवन में उनसे जूझने की औषधि पढ़ रही हुँ मैं मिटा दु उनको एक दिन पूरी तरह से ऐसी खूबसूरत सी जिन्दनगी बना रही हूं मैं इसीलिए कविताएँ बना रही हूं मैं🌹✍️ -डिम्पल प्रजापत🌹✍️ 9588055373
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