बंदर और मदारी

ये कविता एक ऐसे दृश्य को दिखाती है जो दुसरो के लिए सिर्फ एक खेल मात्र है लेकिन अगर इसे ध्यान से समझा और परखा जाए तो ये जंजीर बिना एक गुलामी है । एक बंदर जिसका मुक्कदर उस का मदारी है ।

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